Saturday, March 12, 2016

सूक्ष्म परत ।

हर क्षण प्रतीत होता
अपनी विशिष्ट पहचान के साथ
समय की धार अत्यंत पैनी
चीरती जाती वक्त गूँथी अतीत दीवार
ओर पुख्तापन का दावा
होता रहता नग्न अतीत मिटता
अति सूक्ष्म अदृश्य बन
ओर वर्तमान अंकित करता
अपना सच नवनिर्मित
भीतर का अनुभूत होता जाता
साफ बेनिशान
क्षण चेतना शांत नहीं
बड़ी उतप्त जलाती जाती
जमा जमाया असत का मेल
ओर करती जाती आलोक
नव चेतन की सूक्ष्म तंरग
बसती जाती अंतर
शायद यह नयी हैं चेतन की
सूक्ष्म परत जिन्दगी की ।
छगन लाल गर्ग।