अंकुर जीवन मूर्त
प्रस्फूटित धरा
स्व साकार हुआ
यह कहना ठीक
धरातल के सीने का
छेद भरा
उर्वरा भूमि ममत्व साकार बना
मेरे तन से
ओर शुद्रता मेरी अहंकार भरी
दमन करता स्वभाव कहता
कि नहीं क्षमता कहूँ
कि चीर कर उसे
सृजन पाया
ओर पनपना मेरा सामर्थ्य
सच नहीं यह
जीवंत क्षणों का
उपभोग
नहीं स्वयं की सामर्थ्य
प्रकृति का हर अणु
विकास मे रहा
आधार मेरा
रक्षक मेरा
अब अनुभव कहता
मात्र याचक हूँ मैं
ओर मांग करता
कृपा दृष्टि दो पहचान की
सत्य असत्य की
आँखें दो कि
देख सकूँ पर पीडन
ओर फिर
कर सकूँ याचना
सृजक से मिले
हर जीवन को
उसका अधिकार ।
छगन लाल गर्ग ।
प्रस्फूटित धरा
स्व साकार हुआ
यह कहना ठीक
धरातल के सीने का
छेद भरा
उर्वरा भूमि ममत्व साकार बना
मेरे तन से
ओर शुद्रता मेरी अहंकार भरी
दमन करता स्वभाव कहता
कि नहीं क्षमता कहूँ
कि चीर कर उसे
सृजन पाया
ओर पनपना मेरा सामर्थ्य
सच नहीं यह
जीवंत क्षणों का
उपभोग
नहीं स्वयं की सामर्थ्य
प्रकृति का हर अणु
विकास मे रहा
आधार मेरा
रक्षक मेरा
अब अनुभव कहता
मात्र याचक हूँ मैं
ओर मांग करता
कृपा दृष्टि दो पहचान की
सत्य असत्य की
आँखें दो कि
देख सकूँ पर पीडन
ओर फिर
कर सकूँ याचना
सृजक से मिले
हर जीवन को
उसका अधिकार ।
छगन लाल गर्ग ।