Saturday, March 5, 2016

यह बिखराव ।

बिखरना लगभग
तय रहता
हर बार जिन्दगी में
नहीं उपाय रोकना
असमर्थता
मात्र नहीं कारण
बिखराव
अनिवार्य शर्त
इकजाई होने की
नया अस्तित्व
पनपता तभी
जब बिखरता पुराना
ओर पुरातत्व
बिखराव बहुत मुश्किल
आशक्ति का हठ
समूची शक्ति लिए
तौड देता भीतर का ध्येय
नहीं मिल पाता सहारा
स्वयं का भी
अन्य का भी
यह मौह का राग
नवीनतम
रौशनी की झलक
तर्क ओर चिंतन से संभव
अच्छा हो
हम बदलाव से पूर्व
सचमुच तल्लीन हुए
नयापन का
पुख्ता विवेचन
तो करें
तभी
बदलाव का सच होगा
हितकारी
समाज व स्वयं के लिए ।
छगन लाल गर्ग ।