Saturday, March 26, 2016

नैतिक जीवन ।


कोसता हूँ मैं
कभी कभी नहीं
हमेशा अपने आपको
यह नही हुआ अभी
हो जाना चाहिए था
आत्म निन्दा का भाव
नहीं हो सकता मुझे
बहुत नैतिक जीवन मेरा
घने गहरे बसी हुई
संस्कृति की जडे
हर क्रिया शुद्धता लिए
पावनता का प्रदर्शन
तन व्यवहार मे भासीत
वर्ण व्यवस्था की पावनता
हमारे से बनी
अशुद्ध लोगों से रखता हूँ दूरी
निन्दा पात्र हैं वे
जो नहीं जीते अपने वर्ण
व्यवस्था के शत्रु भी
नैतिक जीवन के शत्रु भी
हमें कहते जाते पाखण्डी
पर जब कभी लौटता
अपनी आत्मा के उजाले
करता हूँ महसूस
कि नैतिकता से जुड गया
सत्य मे पाखण्ड
यथार्थ मे
नहीं हूँ मैं परमेश्वर का आशक्त
केवल दिखावटी आदर्श का बना
पाखण्डी पुतला
ओर होता जाता साबित मुझसे
निन्दा करता जाता मैं
सबसे अधिक पाखण्ड की
समझते अपने को
नैतिकतावादी
 संचय निरंतर अब बढता जाता
खुद अपने पर
ओर कोसता रहता स्वयं को।
छगन लाल गर्ग।