आँखें
कब देख सकेंगी
सत्य
वासना रहते
निरंतर भटकाव दृष्टि
सौन्दर्य पर
यहाँ वहाँ केवल नयन सुख
कहां कहां नहीं पहुँचा
दूर ही सही
मिले मदमाते उभार लिए
अनुपम संवरा हुआ
तीर सा चुभता
कसक भरता सौन्दर्य
कि बढ़ती रहे बेचैनी
पा जाऊं परख सुंदरता की
ओर तब
करू चर्चा भीतर बाहर
स्व मय सफल आँखों का
सार्थक होना ओरों को
ओर मैं यूँ ही
अतृप्ति के गहरे अंधेरे कुएँ
गिरता रहूँ निरंतर
लालसा का संबंध
आँखें जोडती भी ओर
बार बार तलाश करती
लावण्य के नये बिम्ब
कि इसी मकसद
सृजन का सुख नकारा कर
गुजरती रहे बेभान जिन्दगी ।
छगन लाल गर्ग।