Sunday, March 6, 2016

ले लो तुम्हारा ।

बहुत भराव हुआ अब
छलकने लगा अहसानों का उफान
कब तक रखूँ नीचे गर्दन
दुखने लगा अब शरीर का रोम रोम
कृपा का विशालकाय दरिया
अब मुझे डूँबों देगा
नही तैर पाऊँगा नही आती तैराकी
बस करो नही  सामर्थ्य
तुम्हारे गहरे चुभते कटाक्ष
हर पल मारते है कौडे
बहुत गहरे अदृश्य भीतर के भीतर
ओर अब लगता
जर्रा जर्रा मरने लगा हूँ मैं
मरने का यह सिलसिला  अति नारकीय
फिर नही विश्वास ईश्वरीय मौत
इन्तजार बनी रहे
अधूरेपन में कहीं हो नाजाऊँ शैतान
नही चाहता बेहतर जिंदगी
तुम्हारे  अहसानों से भरी
अच्छा रहेगा ले लो तुम्हारा
चुकता हिसाब
रक्तसंबंधों की उम्र आजकल
अबोध वय तक का हिस्सा ।
छगन लाल गर्ग ।