सुखी हूँ मैं
क्या गलती मेरी
यदि मैं करता हूँ भरोसा
हर इन्सान की नियत पर
बेवजह नहीं पूछता औकात
किसी से
ओर खुद संतोष कर लेता
जो भी मिलता
ना मिले कुछ नहीं होता
असंतोष का अहसास
नहीं उठता नीचे जमें तल से
बेठना उठना नहीं मेरी मर्जी का
वह जाने बिठाये कि उठाये
नहीं ऐतराज मुझे
कोई पहाड़ बने कि नदी
यह उसकी प्रवृत्ति
नहीं करता दमन अपना
रोज रात पहुँच जाता
अचेतन में
जहाँ न शरीर न संसार
छोडा छुटता सा
ओर प्रभात के समय जागता हूँ
सर्वांग चेतना लिए
मिट्टी का तन मिट्टी ही
सत्य
फिर इसके लिए क्यों करूँ गलती
दुखी रहने की
सुखी रहना स्वभाव हो
हम सभी का ।
छगन लाल गर्ग।