Tuesday, March 15, 2016

उष्णता।

नहीं रहा ठंडापन
मृतप्राय अतीत जीना
नहीं आता
जबकि बार बार दौडता मन
अतीत की खाई
जहाँ हजारों असत्य
कलुषित कालिमा घेरे ढेर
स्पंदन हीन
अतिशय दुर्गंध देते
समय की करवट साक्षात सत्य
मूर्त करती
ओर मन विगत व्याप्त
कटु यथार्थ से विमुख
चाहने लगता विगत सुहाने पल
कैसे हो यह असंभव
नहीं रही अतीत मे उष्णता
मृत्यु हैं अतीत
केवल ठंडक
चेतना की चिंगारी भी
केवल वर्तमान मे
मन जंगल के अतीत
जलाकर करती राख
ओर भरती जाती जीवंत क्षण
चेतना की उष्णता ।
छगन लाल गर्ग ।