Sunday, March 20, 2016

स्व प्रज्वलन ।


स्व प्रज्वलन
विचारों का मंथन कम
विध्वंस अधिक करता
आस्था से घीरे
सदियों से मिलते रहे
अंधविश्वास
अति गहरे घने धरातल
जीवन तल छितरे हुए
धधकते जलते रहते
विचारों की चिंगारी
चेतन होते ही
मिटता रहता मिथ्या
जमा असत्य
ओर नव अंकुर लेती चेतन
आस्था टटोलती सत्य
जीवन का
हर चमक प्रकटती अपनी तेजस्विता
ओर बाह्य दृश्य बन जाता
रूपक सौन्दर्य भरा सत्य
नहीं झलक मात्र
उस अनुपम की
देती बहुत भीतरी चेतना
कि जल उठे दीये अलौकिक के
ओर यह तुच्छ जीवन
बन सके धरोहर
अग्रिम पीढ़ी के लिए
अनुसंधान बाहर का नहीं
स्व संबोधित सत्य का होने दो ।
छगन लाल गर्ग।