Friday, April 1, 2016

उजालों की ओर ।


कैसे बढ़े कदम
उजालों की ओर
नहीं हो पाती पहचान
अंधेरो उजालो की
हर अंधेरा देता बढ़िया चमक
असलियत से ज्यादा
नहीं कर पाता फर्क
चमक की चकाचौंध का
नकली असली का संदेह
झेलता फसता रहता नित्य
अविवेक कंदरा के भटकाव मे
क्या हो
नकली को नहीं देख पाता
नकली की तरह
कास यह आ जाता परखना
तो मिल जाता असली
फिर क्यों भ्रमित रहता
नकली को असली मानकर
असार हैं हर पदार्थ
नहीं आया मुझे आजतक
असार की तरह देखना
आ जाता यह
पा लेता सार जीवन
प्रर्याप्त हो जाता
अंधकार को अंधकार समझ लेता
नहीं हुआ अबतक यह
ओर हो जाय यह मेरे जीवन
निश्चय यही तुम कदम बढाते
राह चलते रोशनी पाने ।
छगन लाल गर्ग ।