धारणा का सत्य
बदल देता जिन्दगी
अचानक नहीं होता पाना
इच्छित
देखना होता भावना के धरातल
आस्था अटूट
समझ आये सर्वांग
नहीं आवश्यक
कोई आंशिक गुणवत्ता
लानी होती धारणा में
ओर यह देखना पदार्थ में नहीं
चेतना के स्तर पर हो अदृश्य
दृष्टि समर्थता
बड़ा अजीब सत्य जिन्दगी का
वही पाते हम
जिसे सुरक्षित रखने की जगह देते
हृदय के किसी कोने को
रिक्त रखते धारणा में
संजोये सत्य निमित्त
अलौकिक ईश का
आस्थामय स्वागत
तभी होगा जब
सत्कारमयी दीदार की
होगी प्रबलता
ओर हृदय
होगा साफ सुथरा प्रभु योग्य
महान परमेश्वर आता हैं
भाव जगत मे स्वागतीय सिंहासन
निर्मलता से सारोबार रहें ।
छगन लाल गर्ग ।