Thursday, April 28, 2016

होली आई ।

आई अब अलमस्त तूं होली
प्राणों मे ललक नवल रस गागर
छलक छलक रस धार गिराये
अवनी अँचल सौरभ छलकाये
लहर उठी चित सागर में
प्रेम क्रीड़ा भंवर उफान घीरा रे
मन चंचल उभार तन गिरता जाये
रंग बिरंगे सपने सच मे
आज सभी मिल मिश्रित कर ले
तेरा मेरा मिल जाने दे
नया रंग मिल अंकुर ले ले
उछल उछल अरमान सारे
बहुरंगी बन हमे नवरूप दे
भाव भरा मेरा प्रेम भीगा रंग
बिखर जायें तेरे आँचल में
देख अलबेली
अल्हड यौवन तेरा
करवट लेता भीगता जाये
आओं ना जरा
थोड़े से पास भी मेरे
मादक नेह कंपन राज समझ ले
महक उठी तेरी रूपहली मदिरा
मुस्काने लगी अब अधरों की लज्जा
नाजुक देह तेरी अंगुरी सी डार
रंगों मे घूलता जाय रंगीला यौवन
गीले बदन मे उठता मद ज्वार
मन नहीं तन नहीं फिसलन
केवल मदहोश मौसम आज
मिल मिल जाते प्रियतम गात
उन्माद गहरा बेबूझ हुआ भान
तूं ही तूं छाई हर ओर
प्रेम मदिरा पान किया अब
नशा घना उतरे नहीं तुम बिन
आओ प्रिये बन रसभरी कलिका
मकरंद घना उफनता जाय
लोलुप भंवरा नियत नहीं नियंत्रित
अलक पलक बेभान बुलाये
रंगों मे प्रेम रस रंग मिला ले
होली त्यौहार जीवन बन जाये ।
छगन लाल गर्ग ।