घनत्व चाहत घीरा
सामर्थ्य ससीम रहते
असंभव कामना पूर्ति
कुंठित पूर्वाग्रह
भटकन शिथिल जर्जर तन
अभिशप्त हुआ जीवन
रश्मि जलन देती
अंधकार अपना अपनत्व देता
नहीं अब हिम्मत
प्रकाश किरणों का कर पाऊँ सामना
नहीं रहा नूर नयनों में
नहीं जीवंत पल वक्त लाता
कि जागे चित विश्वास लेकर
लगता यही सत्य
सुख चुका दरिया हलचल भरा
पल भार युक्त हो चुके
दमन होता जाता वक्त के साथ
ख्वाब कामना का
शायद सूत्रात्मक हूँ मैं
नहीं हो पाया सरलीकरण मेरा
जिता रहा जटिलता अहंकार मोह
करता रहा अति विद्ववता से मोह
ओर होता रहा अवाचनीय पृष्ठ
फिर बोधता से होता रहा
उपेक्षित बार बार
समझ लायक अपनों से
सरल शब्दों से नहीं कह पाया
तुम मत करो अपेक्षा मुझसे
नमनीयता शब्द नहीं ले पाये
कि बहने लगूँगा फिर धरातल
हिम खण्ड सा जड़ तनाव भरा
नहीं पहुँच पाती चेतन किरण
कि तपिश पाकर पीघल सकूँ
अंधेरे अब मकसद बने
विश्रान्त मौन गहरी खाई निमित्त
भरो ना अतिशय अंधकार
तुम दो ना कोई कालिमा गहन
लिपटा लूँ अस्तित्व मेरा
कि ना देख पाये चैतन्य मुझे
विरह विकल ना पास आये
समझ बेबूझ बन जाय
मत डराओ मुझे चेतना राक्षस आता
हो जाता हूँ ओट दीवारों के
अहसास भ्रम नहीं बाहर आये
गिरता हूँ हर बार चेतन बन
उड़ान भरता असीम नभ
हताशा मत आओ घाव भरते नहीं
जडवत जीवन जख्मी घना
ठीक हूँ मूल प्राकृत बना
रहने दो उसी दशा शायद श्वास ले सकूँ ।
छगन लाल गर्ग ।