Saturday, April 16, 2016

बुढ़ापे का खोफ ।


जर्जर छत से
गिरने लगती
सीमेंट निर्मित परते
ओर दिखने लगे
बीच के सरीये
खतरा अब बढने लगा
दिनोंदिन
ओर भाव बताते कारीगर
रिपेयर का ओकात से बड़ा
भरता हूँ हाँ पर
नहीं आते शायद
विश्वास नहीं कर पाते
मेरी हालात जान
इंतजार करते थक चूका
नहीं आते
लडखडाते कृश तन का
अब नहीं भरोसा
जिन्दगी कब क्या बहाना ले जाने का
ओर ऐसे में
मन बैठी दहशत नहीं होती
किसी को कहने लायक
लडना समझाना होता
अपने को अपनत्व से
जीजीविषा ओर गहरी होती
जिन्दगी सडती जाती पर
लगती किमती
हारा थका निरंतर
तलाशता हूँ कारीगर रिपेयर का
कोई मिले जानकार
भरोसे वाला
सोते हुए सहम जाता हूँ
हवा देते पंखे से
भीषण गर्मी मे हवा देता पंखा
हवा से ज्यादा डराने लगा अब
शायद कमजोर छत ढहाने निमित्त
लेता तेज रफ्तार
नहीं आता भरोसा
हवा देने की हो रफ्तार अति
दूसरे पंखों से ज्यादा तेज
गति नियंत्रण नहीं करता काम
बडा संकट काल उतरार्द्ध काल भी
समस्त प्रकृति मानो
सक्रिय हुई जाती
मुझे मिटा देने निमित्त
आह कितना खोफ भरा बुढ़ापा ।
छगन लाल गर्ग ।