Thursday, April 28, 2016

मेरे व्यतीत ।

आये तुम मेरे व्यतीत
अनहोनी नहीं होनी यह
कैसे तुम जा सकते
मुझे छोड
मेरी हर आह ने बार बार
पुकारा तुम्हें
कैसे हो सकते तुम पराये
सुलगते अंगारे पीघल पीघल बहे
आँसू बनकर
विलुप्त होंगे कैसे
तुम हो उन आँसूओं की पीर
 लेते आकार मूर्त हुए
रूप नव अंकुर लेकर
विभूषित करते मुझे विनोद से
आह भार जीवन हरण कर्ता बन
ईश्वरीय कृपा रूप बदला
तुम मे संपूर्ण मूर्त हुआ
सौभाग्य मेरा
अब बहुत संतोष मुझे
तुम देना अंतिम सहारा
मेरे व्यतीत अब आये तुम
नव भव मेरे बनकर
वादा कहां अब सत्य बने तुम
सब मिला मुझे
एकाकार हुआ अब सफल भव मेरा।
छगन लाल गर्ग।