Saturday, April 23, 2016

स्नेहिल क्षण।

निभाने होते
अतीत के स्नेहिल रिश्ते
घने अंतराल मे
 वक्त भी विस्मृत हुआ
स्नेह की नमनीय
 रश्मि ढूँढ पकडता बार बार
ना हो जाये फिर धूमिल
ओर इसी अहसास
निकल आया
अलौकिक अनुभूति भरने
रिक्त हृदय
मेरे स्नेही यह प्यार तुम्हारा
धरोहर मेरा
गरिमा भरा
ओजस्वी निखर जाता
निर्मल स्नेह धार नहला जाती
जीया हूँ मित्र तुम्हें मेरी तरह
नहीं रखा विभाव अलगाव का
इसी अहसास आ पहुँचा
तेरे रोशन धाम
आह घनेरे प्रेमी
 प्रिय जनो का यह मेला
कुछ ओहदेदार
 कुछ विगत झेल चुके ऊँचाईयाँ
सब चमकदार कोहीनूर
इर्द गिर्द तुम्हारे
 नहीं भूलना चाहता
मेरा मोह
 उन चमकीले क्षणों को देखना
ओर स्वर्ग सा आनंद देते जब
लगाया गले मुझे
 सच कहूँ यह क्षण
जीवन का अमोलक गहना मेरा
नही रोक सके मुझे
अच्छा किया
हीनता भाव आखिर
कोई कब तक
अपना हृदय सोखे
चलो चलता हूँ यादो को लिए
सहारा बनेगी अवशेष का ।
छगन लाल गर्ग ।