ओर यह नेह
वीणा स्वर सा
अति कोमल
पंखुडियों की
लालिमा सा सौंदर्य
सुरभिमय श्वास बनकर
पहुँच भीतर दस्तक देता
हल्की तरंग बनकर
हो जाता हूँ शून्य
अस्तित्व हीन
मेरे नेह
जब जब तुम रमते मुझमें
तब नहीं करता दावा
कि मैं नेह लीन हूँ
नही कहता यह भी कि मैं
अलिप्त हूँ
नहीं यह भी कि
बन चुका वीत रागी
निस्सार निरर्थक निस्प्रयोजन
केवल नेह
रमता अंगडाई लेता
अनुभव की
भावनात्मक तंरगो बीच
नही कोई दावा कि
करता हूँ प्रेम
पर जरा महसूस करो
मौजूदगी नेह
भीतर कुछ हलचल होती
अद्वितीय घटा भीतर भीतर
अजीब सा
मस्त सा आत्म विभोर सा
जो नहीं घटता कभी
साधारण में
ओर यह दशा
मात्र अनुभूति ही
अभिव्यक्ति का
बुलंद दावा कमी नहीं
शास्वत प्राणों का प्रफुल्लन
पवन सा अदृश्य सुगंध सा मोहक
मेरा नेह ।
छगन लाल गर्ग ।