Sunday, April 24, 2016

संसार चक्र ।

संतुलित चलता रहता 
संसार का चक्र 
यहां निमित्त बना संसार भी
परमात्मा प्राप्ति कारण
संसार रूपी रथ के पहिए हम
सारथी ले चला मन हमें
आश्वासन देता फुसलाकर राग लय मे
अनंत सुख का भरोसा देता नित्य 
सूर्य की तरह 
जीवन अंधेरे हटाने का आश्वासन देता
खिंचता जाता जीवन रथ
हमे जा रहे खिंचे हुए बंधे हुए 
यह रथ चलता रहेगा 
सूरज चाँद तारे सभी 
आयेंगे जायेंगे 
होता रहा इसी तरह युगों से
सत्य यही 
पृथ्वी पर हरियाली खिलेंगी
पक्षी कलरव करेंगे प्रेम मय
लेकिन हमे  इसी तरह 
अंधेरों मे खोये 
भौतिक माया मे फसे बंधे बंधाये
रथ के पहिए बन घिसते रहेंगे 
मन का दमन किये बगैर 
कैसे बन सकती आत्मा हमारी 
रथ की सारथी 
ओर तब तक मुश्किल हमारी 
परमात्मा तक रथ हांकने की 
मन के भरोसे संभव नही ।
छगन लाल गर्ग ।