Saturday, April 9, 2016

रद्द होता रहा ।


रद्द होता रहा मैं
निरंतर अपने
भावनात्मक रिश्तों से
अपरिमित
स्नेहिल विश्वास के हाथों
नहीं यह बात की मापदंड निभाते
थका हारा सामाजिक
या कि समर्पित रहा कुटुम्ब सा
यह सत्य
नहीं रख पाया नीजता पारिवारिक
ओर टूटते परिवार का तार
काटते रहे अपने मतलब मारे
ओर विघटन कगार बन
ढहा दिया गया एक उम्मीद भरा वृक्ष
जीवन का संगीत नहीं रहा
आज सारे राग विरान
टूटे तार विभत्स लगती वीणा
परंपरा निभाना अलग कर्म
बढ़ चढ़ कर्म लीन मिट जाना
पर मिटना यह धूल होना
नहीं विकसेगा
अंकुर पनपता नवीनतम
विश्वास आस्था का
नहीं हो पाया अपनत्व
भावनाओं की तरह
हर रिश्तों मे
स्वार्थ रोगन बन चढता रहा
रक्तिम संबंध नाजुक भाव
तटक कर टूटते रहे
जब तक नहीं हो पाया
स्वार्थ गीला तब तक
आह मर्मान्त पीड़ा कैसे भोगूँ तुझे
बड़ा विभत्स सत्य जिन्दगी तेरा
यहाँ खेली जाती स्वार्थ की होली
सारे रंग चिकनाई चाहते
सार मर्मज्ञ पाने के निमित्त
रहते संसर्ग में छाया बन कर
कंगाल करामत देते
ओर रंगों की कालिमा भिगो देती
बदशक्ल बदनाम हुआ
गुजरता आज हर लम्हा
बड़ा मुश्किल हो जाता फिर
चेतन बन फिर उठ पाना
घर बदर करने का खेल
मंजे खिलाड़ी बन खेलते
ओर परिणाम यही
रद्द होता रहा निरंतर
मेरा अस्तित्व
अपनों द्वारा
उपयोग लेने के बाद
आज मैं
रिश्तों का अवशेष हूँ
खंडहर बना ओर रद्द हुआ
खारिज हुआ पडा अतीत
अनुपयोगी सामान की तरह ।
छगन लाल गर्ग ।