Thursday, April 28, 2016

रोशनी ओर नींद ।

नहीं पता नींद रात भर
आती भी रूकती डरती
अधिक तर रोशनी रहते
आँखों का बुरा वक्त
जलते दीये रहते घेरे
आँखों की रोशनी बंद पलकों से
झांकती पलक के पार
सिन्दूरी घनत्व
से होना पडता एकाकार
मोटी परतों मे कुंठित हुई
बाहर पसरे उजालों से विलग
दीवारों सिमटी रोशनी
तेज हीन विवशता से बाधित
विश्राम कहां अपनेपन का
फिजूल का बाहरी प्रकाश
करता बाधित
नींद के गुमनाम अंधेरों में
नहीं जाने देता
ओर अचेतन की दुनिया
जहाँ भटकता पाना चाहता मैं
विश्रान्ति का राज स्वप्नवत
सुख भरा डूबना चाहता संपूर्ण अस्तित्व
बाहर भीतर दोनों ही उन्मादित
देते रहते चेतन का गुलाबी आँगन
अचेतन ना पाऊँ
पर सत्य इतना सा
बिना अचेतन पाये चेतन
नहीं ला पाता असलियत में
नवीन ऊर्जा ताजगी युक्त सवेरा ।
छगन लाल गर्ग ।