बढ़ती विशालकाय मंजिले
रोकती जाती
मुक्त पवन निर्धनों की
कि नहीं ले पाये श्वास
ओर छीना जा सके
प्रकृति प्रदत हक मानव का
गगन स्पर्श चाह लेती मंजिले
लोलुप स्वार्थी
व्यक्ति की भावनाओं का बिम्ब देती
कहती जाती हैसियत का हिसाब
ओर क्रूर दानवता की भावना
कई झरोखो से देखती
मामूली दुनिया को
रेंगती हुई जमीन पर
ओर मीठे अहसास भरती
अहंकार की ऊँचाई
ठीक निर्जीव आत्मा की
कालिमा उभरती
दौडने लगती विनाशक आँधी सम
उजडते जाते कच्चे घौसले
कच्ची दीवारें
उजडने की शर्त पर
पनपता तुम्हारा अस्तित्व
मंजिलो की पृष्ठभूमि करूण
पर विध्वंस स्वर लिए
देती आवाज
अनेकों बेगुनाहों के बलिदान की
मर्म वेदना लिपटी सिसकिया
ओर अनेकों कुमल्हाये कुसुम
भरते चित्कार
आह यह मर्म भेदी स्वर
बहरे कानों नहीं सुनते तुम
या कि जडवत हो चुके प्राण रहित
तुम्हारा अतीत ओर वर्तमान दोनों
अमानवीय तृष्णा से लिप्त
अहंकार के बिम्ब तुम्हारे महल
दास्तान देते बर्बर इतिहास की ।
छगन लाल गर्ग ।