खोलो ना कपाट दिल के
बाहर छायी धूप प्रखर
ज्ञान का विस्तृत प्रकाश फैलाये
सूखता प्रतिपल स्नेह स्त्रोत
खोलो ना कपाट दिल के
बाहर सारे ज्ञान पीपाशु
भर भर गठरी ज्ञान बांधते
उठे बोझ से शिथिल हुए फिर
बिना चाह बौझ मुझ पर लादते
क्षण भर ज्ञान झेल नही पाता
खोलो ना कपाट दिल के
हम सब अज्ञानी नासमझी जीते
पर पूरी अकड से जीते
समझ आती कैसे बंद कपाट मे
तनिक ना कपाट खुला रखते
समझ के पंछी आना चाहे
अहंकार कपाट मजबूत बनाये
केवल कपाट प्रेम का खुला
अहंकार जहां विलुप्त हो जाता
समझ बन जाती प्रेम सरिता
हृदय समतल फिर बहने लगती
ओर पीयूष स्त्रोत मानव मन भरती
अब खोलो ना कपाट दिल के
बहना चाहती स्नेहिल सरिता ।
छगन लाल गर्ग ।
बाहर छायी धूप प्रखर
ज्ञान का विस्तृत प्रकाश फैलाये
सूखता प्रतिपल स्नेह स्त्रोत
खोलो ना कपाट दिल के
बाहर सारे ज्ञान पीपाशु
भर भर गठरी ज्ञान बांधते
उठे बोझ से शिथिल हुए फिर
बिना चाह बौझ मुझ पर लादते
क्षण भर ज्ञान झेल नही पाता
खोलो ना कपाट दिल के
हम सब अज्ञानी नासमझी जीते
पर पूरी अकड से जीते
समझ आती कैसे बंद कपाट मे
तनिक ना कपाट खुला रखते
समझ के पंछी आना चाहे
अहंकार कपाट मजबूत बनाये
केवल कपाट प्रेम का खुला
अहंकार जहां विलुप्त हो जाता
समझ बन जाती प्रेम सरिता
हृदय समतल फिर बहने लगती
ओर पीयूष स्त्रोत मानव मन भरती
अब खोलो ना कपाट दिल के
बहना चाहती स्नेहिल सरिता ।
छगन लाल गर्ग ।