रीता रहा जीवन
कतरें रश्मि पाये बिना
खूबसूरती भरी दुनिया
घने अंतराल पर
तन मन का विलय
आखिर विवश शून्य में
निरंतर बिखरते मन के ख्वाब
अचेतन चेतन दोनो
धुँधलके में गुम विवर उदास घना
जिन्दगी का
नहीं आसरा नहीं अस्तित्व
केवल आभासित जीवन
स्पंदित धड़कन कहती
जिन्दा होने का रहस्य
अतिदूर सागर की लहरों का स्वर
गर्जता देता आवाज
आओ तुम एक बार मिले गले
उन्मतता की ऊँचाई का सच
तन नहीं बंधन वहीं
जर्जर जाल जिन्दगी ज्वाला देती
विलय ही सार
कर सको करो मंथन एक बार
नहीं पाओगे बार बार
आओं ना सिखा दूँ मदहोश अंगडाई
लहरों का उत्थान ना बने पतन
सिखा दूँ सार यदि चाहो
करों विश्वास स्व पर
मिल सकोगे चेतन अचेतन तक
सुनो महीन स्वर भीतर भरा
अहसास सुनता
चहुँ ओर से नित
कल्पनाओं के तार झीने
देखते ही टूट जाते
सुख जिनके हिस्से आया
मत जलन भरो
यह होने दो कि खुशहाली लिए
मतलब जीते लोग तुम्हें
हँसते रूलाते चल देंगे
अच्छा रहेगा तुम्हारी चेतना
हलचल मंथन अवसर पाये
ओर तभी
आस की नवल भोर होगी
सुख की शीतल छांव अहसास
शायद मिले विश्वास करते रहो ।
छगन लाल गर्ग ।