Wednesday, April 27, 2016

तुम हो क्या ।

तुम हो क्या थोड़ा ठहरों
अपने भीतर
शायद संभावना बने
मनुष्यता का कोई अंश कहीं
तडपता ढूँढता राह अंधेरो बीच
मिल सके तुम्हें
अच्छा होगा पहचान लो अपनत्व
वहीं असल में हो तुम
बहुत कम अस्तित्व पर सर्वांग पूर्ण
नहीं हो पाती पहचान
अपनी अपने से जीवन काल
ओर चलता भ्रमित भटकाव
मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे गीरजाघर
कहां नही ढूँढना होता
हारा थका करता जाता शास्त्रीय चेष्टा
तुम्हें समझने जानने की
एक अटूट भटकन भरी उलझन
पाता जीता रहा असत्य
अब लौटना चाहता मूल में
साक्षी बन देखना चाहता मेरे अस्तित्व
निकलना चाहता थोड़ा बाहर
शरीर से बाहर
ओर मिलना चाहता अदृश्य चेतन से
संचालन शक्ति की ऊर्जा
घनीभूत होकर करती नव सृजन
पहचान की चेष्टा अब अंतिम निर्णय
ओर इसी निमित्त शरीर से बाहर
पर आत्म तत्व भीतर करना होगा प्रवेश
तभी संभव होगा जानना स्व को ।
छगन लाल गर्ग ।