Thursday, April 28, 2016

भटकन।

कठिनाई हैं बड़ी
नहीं होती शिथिल
भटकन
बढती बेचैनी निरंतर
नहीं ज्ञात रिक्तता
असीम आकांक्षा से घीरा
निरीह अक्षम बना
ढूँढता जाता अनंत में
अपनी सुख तृप्ति निमित्त
उडता जाता मेरा नित्य
चेतना कबतूर
नहीं मिलता कहीं ठौर
ओर थकान आती नहीं
कि करे आस विश्राम
अल्पता भरे छितरे छाये
उड़ान सत्य असत्य भरा
बेभान बेबूझ
कभी किसी ने कहां पाई
विश्रान्ति अनंत अतीत मे
सत्य झूठलाती चेतना को
कैसे मिलेगा किनारा
बाहर बाहर
असलियत जानबूझकर भी
चमकदार तृष्णा से
हठ करता जाता सुख की
ओर चेतन भ्रमण
होता रहता भ्रमित
क्षणिक प्रलोभन
भूल भूलैया का सुख देकर
जर्जर करते जाते स्वप्न
सत्य रह जाता अपूर्ण
अजान
लौटोगे क्या मेरे चेतन
वापस अपने घर
भीतर हैं सर्वस्व जो चाहते
बाहरी यात्रा
सुख नहीं केवल मृगतृष्णा
करो विश्वास खुद का
शायद पा जाओ पूर्णता का सुख।
छगन लाल गर्ग।