Tuesday, April 19, 2016

बढिया सजावट ।

बहुत बढ़िया
सजावट बाहरी बाहरी
भीतरी सत्य ढका ढका
सूक्ष्मतम अभिव्यंजना
झलक देती तुम्हारे सौम्य
चरित्र की
बड़ा सुंदर व्यक्तित्व से मेल खाता
पहनावा तुम्हारा आधुनिक प्रबुद्ध
शिष्ट सभ्य आचरण
मंजा हुआ अतुलनीय
ओर भाषा गरिमा भरी
उदघोष गरजता प्रभुत्व भरा
एकाधिकार मेरे शिल्पी
हर अदृश्य कृत्रिम हुनर पर
शब्द घबराते से
तुम्हारे व्यक्तित्व से भयभीत
करते सजावट अपनी
विवशता में आपा खोते
मिटते अस्तित्व देते सहारा
मित्र सम अंग्रेजी के शब्द
वाह कितना उदात्त दृश्य
सुंदर तारतम्य भाषाओं का
अजीब हुनर पा चुके शब्द भी
मेरे प्रबुद्ध वक्ता
हर कण हर क्षण
तुम्हारा भोगा जाना
तुम गहनतम जटिलतम
प्राणांत समय के दूसरे ईश्वर
व्याधियों के वैध
मेरे  विचारक
तुम लिखते तब समझ आता
प्रकृति का स्वरूप
हवाओं का बहना
फूलों का खिलना
बादलों का गरजना भी
बरसना भी
साक्षात से भी अतिसुंदर होती
तुम्हारी भाषण अभिव्यक्ति
यह प्रकृति का रूठना
ओर फिर लौटना सौंदर्य में
कहां देख पाता किसान
अपना खेत
कवि की कविता में भी
कहां हैं सौंधी गंध
तुम्हारे कथनानुसार
सच्चे पारखी मेरे अन्वेषक
केवल तुम
मिलती मिट्टी गंध
ओर किसान का
श्रम बसता तुम्हारे किये अन्वेषण में
कितने तरकीब बता देते शब्दों से
असल में नही तुम्हें किसान से
लेना देना
ना फूलों से ना प्रकृति से
ओर ना अभाव झेलते लोगों से
नाम लेते रहो इन सबका
करते रहो भाषणों में
नित जख्म छूते शब्दों से दोस्ती
गरज रहने तक
सौंदर्य सत्य ओर खोज का
शब्दों के सुरभित हार लेकर
पिरोया करो
अपनी राजनीति की विजय माल
असल मे तुम
अपनी भीतरी वासना के सताये
यही कारण
सुंदर शब्द देकर सत्ता सुख में
जीना चाहते ।
छगन लाल गर्ग ।