Tuesday, April 26, 2016

विकल व्यथा ।

बहने दो आँसू
विकल व्यथा घनीभूत हुई
द्रव्य बन बह जाने दो
जानना चाहते हो तुम अज्ञात
भीतरी रहस्य
ओर निवृत्ति राह अदृश्य की ओर
करूणामय जीवन लिए चलना चाहते
चैतन्य रश्मियाँ आच्छादित
संभावना तुम जान लो यह तुम्हारे हाथ
भीतर अतिशय वेदना का दरिया
बहना चाहता अति सौभाग्य हमारा
बहने दो आँसू बन
हृदय होता जाता खाली रिक्त होने दो
आ रही जीवन में प्रभात बेला
समग्र शून्यकाल घेरता जीवन
आह बहुत मधुर मादक रश्मियाँ
अज्ञात अनजान राहो का दीदार देती
बहुत चकाचौंध नही निर्मल शांत भरा भरा
हर जिज्ञासा का समाधान देता
नीरव काल
अस्तित्व अंतिम रहस्य देता सा
जीवन मुक्त असीम यात्रा का पथ प्रदर्शन
केवल यही पल निर्मल जीवन कारण बना ।
छगन लाल गर्ग ।