Sunday, April 3, 2016

कब्जा ।


नहीं लगता अब
उपाय वापसी घर
हो चुका कब्जा
बैंक ऋण से बने मकान
पर दबंगी भाइयों का
ओर ऋण की किस्ते अब भी
कटती पैशन से
उपद्रवी अपनों का
अब घर मेरा बन गया
कुछ भाग
बेठक का ओर कुछ स्टोर
नहीं हिम्मत उनसे माँग करू हक की
बडा अजीब जमाना
हमेशा पक्षधर रहा दबंगो का
ओर संस्कार नहीं कहते
लडूँ कानूनी लड़ाई
गाँव से बहुत दूर
टकटकी लगाये देखता सपना
अपने घर का ।
छगन लाल गर्ग ।