साक्षात संसार दृष्टिवत
नहीं सत्य
यह दृश्य परिवेश नित्य
परिवर्तनशील
ओर सत्य यह भी
नहीं प्रवृत्ति सत्य
क्षण भंगूर हो सके मूल
सत्य कथन हो अदभूत
पर स्वीकार्य कि
यह जगत मात्र काल्पनिक
दृश्य भी अदृश्य भी
स्वप्नवत
तन्द्रामय अनुभूति में सत्य
जागृति काल बन जाता असत्य
ओर बहुत गहरे केवल सत्य यह
कि मुक्त हैं आत्मा सनातन
संसार को सत्य मानना ही
बन जाता आत्मा का बंधन
भ्रांतिमय बंधन
जब तक
दृश्यमान संसार तब तक
ओर आज का युग
केवल संसार जीता
विज्ञान से
ओर निष्कर्ष बहुत गंभीर
अंतिम ओर हीन दशा
इंसानियत आ पहुँची
नहीं लगता अति भौतिकता से
बच सकेगी मानवता
सोचना होगा सत्य का राह
भारतीय मनीषा मूल्यों मे ही
जीवन का सार
ज्ञात से अज्ञात की
यात्रा करनी ही होगी समय रहते ।
छगन लाल गर्ग ।