Tuesday, April 5, 2016

लालसा ।






जीये कैसे
बिना लालसा नामुमकिन
जीना
अंबार लगी
अभिलाषाओं की
सच कहूँ
ऊर्जा मिलती
तनिक सी रश्मि प्राणों की
बनती हलचल
ओर महसूस करता हल्का
पर चैतन्य
उभरते सपने लेते अंगडाई
उन्माद जगता
हजारों जुगनूओं का
रश्मि कण दौडते जाते
रोम रोम
ओर मैं महसूस करता
स्वयं को कर्ता
ओर तब उठता संकल्प
दृढ़ इरादे देते सहमति
अभिलाषाओं का
आँचल भरने निमित्त
जिऊँ सतत कर्मठ बना
मत कहो
बुरी लालसा लोभ ओर आकांक्षा
यही जीवन का सेतु
जहाँ जीवन
रफ्तार भरता प्रगति की
विकसित करता
जीवन सुविधाओं का वैभव
ओर कृतार्थ करता मानवता
मत कहना
विडंबना जीवन वासना
यही वह आधार
जिसमें पलता जाता जीवन
नित नया बनकर ।
छगन लाल गर्ग ।