Tuesday, April 26, 2016

सबूत हूँ मैं ।


एक क्षण
पहले तक का
अतीत बन चुका मैं
अनंत अनंत क्षणों का
संग्रहण बन चुका जीवन मेरा
असंख्य विचार भाव ओर उद्गार
जी चुका हूँ  मैं
तब बना हूँ आज
कहीं अच्छा तो कहीं बुरा
हर क्षण रहा मेरी बदौलत
एक अनकही पुष्टता का अहसास
आता जाता पर
नहीं रह पाता स्थिर
अतीत का बिखरा हुआ जोड़
बना हूँ मैं
ओर यह अचेतन का दाग
उभर उभर कर
दग्ध करता जाता मुझे
जीवंत क्षण
अज्ञात उल्कापात झेल कर
घना झुलसा हूँ मैं
भीतर की नीरह अबोधता ने
झेले जख्म अनेक
जलती अग्नि की भीषणता के
हर कोमल अंश अस्तित्व का
जला चुका
विभत्सता का बिम्ब हूँ  मैं
मेरे अतीत का भाग्य ओर
कर्मों का जोड़ हैं मेरा जीवंत क्षण
अतीत ओर वर्तमान का
सम्मिश्रण ओर विश्रृंखल समय का
सबूत हूँ मैं ।
छगन लाल गर्ग ।