क्या होगा कभी
ऐसा
तुम ना रहो मोहताज
अपनी अभिव्यक्ति सत्यता जाँच
समीक्षकों से करवाने
ओर समीक्षक बिना परवाह
सामान्य जनो के हित देखे
अपने विचार प्रवाह का अहं
समीक्षा पर चढाने लगे
तुम्हारी अभिव्यक्ति पर
अनेकों चौंचे इकजाई होकर
लगे मूल संवेदना को कुतरने
ओर तुम भारी विडंबना झेलते
उतर आओ बगावत पर
यह बगावत तुम्हें
कर देगी कुंठित मूढ
ओर सत्य चाह का एक राही
झूठे सत्य का आवरण ओढकर
होता रहेगा पथभ्रष्ट
नहीं जरूरत सत्य अभिव्यक्ति को
समीक्षा की
वह स्वयं रास्ते बनाती उजाले देती
मोडती जाती जीवन
ओर समीक्षा केवल
पैकेट के पेकेज का हिस्सा
जिससे सत्य ढकने का
होता बन्धोवस्त पूरा
अपनी भीतरी अभिव्यक्ति का सच
केवल तुम्हारा अपना बोध
ओर वही दे सकता सच्ची समीक्षा
छोड़ो बनावट का यह छल
मत रहो अभिव्यक्ति की समीक्षा मिस
मोहताज अन्यों पर
अन्य सृजन नहीं विचारों की विकृति
का उठाते रस इज्जत तुम्हारी पाकर ।
छगन लाल गर्ग ।