दृष्टि मेरी
नहीं पायी आँखें
देखती भी स्थूल असीम
पर नहीं होती निरावरण
एक अपना वासना मय परदा
हर दीदार पर अदृश्य
कल्पना का आवरण
ओर यही आवरण आँखों का सत्य
हर आवरण काल्पनिक
बन जाता मूर्त सत्य
भ्रान्ति सच संसार भटकन देती
मेरी आँखें
मिथ्या महत्व बेबूझ हुई मानती सत्य
नहीं दिखता सरल सीधा
दृष्टि भी रखती अपनी आकांक्षा
अपना चाहा देखने की
यही कारण कि सत्य के ऊपर
छा जाता एक आवरण
मेरा चाहा काल्पनिक
आँखें नहीं हो पाती निरावरण
नहीं नहीं रखता आँखें
वहीं जो देखे साक्षात
बिना अपना पराया निरावरण
अगर यह नहीं सत्य
तो अंधेपन का अंधकार ज्यादा अच्छा
जहाँ व्यक्ति आत्मा समीप
शोभामय जीवन का अधिकारी
बहुत दिव्य अनुभूति जीता योगी ।
छगन लाल गर्ग ।