लोभ
खींचतान करता
जीवन गति होती रहती
असंतुलित
करता प्रयास संतुलन का
शांति पाठ सुबह शाम
पूजा स्थल घर भीतर चलता
खर्च होता नित्य
प्रसाद बंटती
पर टलता कहां असंतुलन
अनजान सी मूर्च्छा जीने लगा
नहीं हूँ संतुष्ट स्वयं से
हर कार्य नहीं भर पाता
अरमानो की झोली
परिणाम असंतुलन
कभी अधभरी सी तो कभी बिल्कुल खाली
नहीं पता
क्या रहस्य अमीरी का
समझना चाहता एकान्त में
ना सुने कोई अन्य कहीं वह
हक भी छीन ले ओर
हंसाई भी हो
नहीं तनिक भी धैर्य अब
जब देखता रातों रात लोगों को
बनते जाते अमीर
याद आने लगा अब रहस्य
पढ़ी कथा का
देव दानवों का संमुद्र मंथन
जहर के बाद निकलता अमृत
ओर मेरे जीवन का जहर लोभ
करना होगा मंथन
तभी संभवतः पाऊंगा संतुलन
ओर होगा फिर अमृत सा
यह जीवन ।
छगन लाल गर्ग ।