Tuesday, April 12, 2016

विराट हैं सत्य ।


कई बार हृदय भरता
भावनाओं की रसधार
पल पल्लवित पवित्र
करना चाहता अर्पित आराध्य
नहीं हो पाता
अनुभूति का भाव नहीं लेता आकार
शब्दों में
सत्य अहसास की निर्मलता
नहीं बंध पाती शब्दों से
गंदले हो जाते भाव
शब्द स्पर्श होते ही
सीमाओं में बंधे हैं शब्द
अर्थों का विस्तार
नहीं शब्दों के अपने भरोसे
व्याख्याओं की विद्धवता देने लगती
नये नये अर्थ
अपने अपने मतलब से विकृत हो जाता
अहसास का सत्य
यह कहना अधिक औचित्य पूर्ण
कि अहसास हैं सत्य
मुक्त तमाम बंधनों से
असीम विराट
समय व शब्द सीमा से
बाहर हैं सत्य
सत्य कथन अभिव्यक्ति
नहीं दावा कर सकती सत्य का
बहुत कठिन व नामुमकिन ही तय
अभिव्यक्ति में लाना सत्य
ओर होता प्रयास सारा ही
सत्य को झुठलाने का
स्वयं का अहंकार साबित करता
अभिव्यक्ति का सत्य ।
छगन लाल गर्ग ।