Sunday, April 24, 2016

विसंगति ।

विसंगति वहन करता
जीने लगा
अस्मिता के लिए पहनना
सीख चुका मुखौटा
नही पकड सकता कोई
सच्चाई की जड
अनेकानेक जडे रखता
नही पकड सकते सत्य की अदृश्य जड
आसपास पुष्ट हुई फैली हैं कई
जीवन दायिनी नकली जडें
असलियत पर आवरण डाले
जागरूक रहता हर पल अपने स्वार्थ
पर साधुवाद के साथ
हर शैली में पारंगत विशिष्ट दर्जा
तुम्हारी कोई तरकीब नही पाती
मेरी असली टोह
बडा मुश्किल हैं मेरे व्यक्तित्व की पहचान
मैं स्वयं भ्रमित क्या जीने लगा हूँ मैं
साक्षात नही
अतृप्ति की वासना जीता हूँ मैं
भरसक करता जाता प्रयास
दिनभर हर कीमत पर चाहता पाना
मेरे स्वप्न मेरी  आकांक्षा
प्यासा हूँ भटकता भी पाना चाहता
सब कुछ जो हैं मेरी चाहत
ओर यही कारण बैचेनी जीता
चैतन्य दिन भर
ओर अचेतन अवस्था में
रात को स्वप्नमय निन्द्रा के साथ
पर यह सब भीतरी बात
बाहर बाहर हूँ घना इज्जतदार
संयमी सज्जन पुरुष
कैसे जान पाओगे मुझे
मुखौटों की दुनिया में ।
छगन लाल गर्ग ।