Tuesday, April 12, 2016

अभागे हम ।


अभागे हैं हम
विद्धवता के झूठी मान्यता के
आवरण से ढके ढके
व्यर्थ विवादों मे उलझे उलझे
तमाम उम्र रहीं उलझन
थक गये नहीं सुलझी
हम हो चुके आदी
बंधी बंधायी गलियों के राहगीर
तमाम पहचान पायी गलियां
अंधी गलियां नहीं झलकती
कहीं रोशनी
भटकन अंधेरों की
बूझाती रहती स्वयं की भीतरी रोशनी
बड़ा अजीब जीवन हमारा
मूढताओं का नहीं गणित
अनगिनत
अवधारणाओं के पुजारी
हम असलियत में जीने लगे
सामूहिक अज्ञात का आडंबर
जिसमें गहरे तल जम चुका
भय का छाया
नहीं हटता सत्य बिना
ओर सत्य खोज का
नहीं अवसर
मूढता भरे कृत्यों के कारण
बोझिल हो चुकी जिन्दगी
भय ओर अहंकार
एक ही ऊर्जा
दौडती हमारी नस नस
ओर यही कारण
हम सामुदायिक रूप से
एक ही जमात के वारिश
अपनी अपनी जमात को
श्रेष्ठ करते जाते
सिद्ध साम्प्रदायिक हिंसा से
आपस मे रक्त रंजित होकर ।
छगन लाल गर्ग ।