Friday, April 22, 2016

एकांत ।


एकांत बोलना चाहता
एकांत बाहरी भी
नहीं हुआ अदृश्य मुझसे
अब करता हलचल
ओर अधिक प्रबल गति लिए
नहीं बाहरी स्त्रोत कि पाता हो ऊर्जा
अदृश्य तानाबाना गूँथता जाता
अतीत संग
ओर वहीं रमता खेलता बोलता हंसता
स्वप्नवत
बाहरी एकांत नीरव शांत गंभीर
पर क्यों नहीं होता प्रभाव
बाहर का भीतर
जबकि हलचली बाहर अभी भी मौजूद
नहीं छोडता पीछा
सत्य यह शायद सार भरा
एकांत बाहर से नहीं देता प्रभाव
जब तक भीतर की भीड़ संसारी
अतीत भोगी
नहीं हो जाती विनष्ट जलकर खाक
यह भीतरी एकांत भी
घीरा रहता अतीत के छाये
ओर नव रश्मि चुक जाती
भीतर रोशनी देने में ।
छगन लाल गर्ग ।