Tuesday, April 26, 2016

जीवन सूत्र ।

कहां हैं जीवन सूत्र
आदमी की असंभव चाह
बन जाती जीवन का असंतुलन
आदर मान का इच्छुक व्यक्ति
नही पाता अपना अस्तित्व
अपनेपन की चाह हो जाती बलवती
ओर हम मिटने लगते भीतर भीतर
क्यों आती दशा बलिष्ठ तन
हार जाता बाजी व्यक्ति मन के हाथ
यौवन का उन्माद चाहता घनी छांव
विश्रांति भरी
आंधी अंधड मिलकर तांडव चाहते
ओर फिर शिथिल विश्रांति
नही कसूरवार मूल्यांकन पश्चात
आवश्यकता बन जाती
आसरा चाहती ख्वाहिश अधोगति
प्रवाहित होने उत्सुक ऊर्जा
गेर विपरीत
नही कहना खेल यह
जिंदगी बिखर जाती एक बोल
ओर नही भाते फिर
अपने आप को घर बिरादरी
जिनके बल अहमियत पायी जिन्दगी
मिला अख्तियार
अपनेपन का एक हिस्सा बने अस्तित्व
परिवार समाज
ओर यह पल का नशा तोड देता
निर्ममता से निस्वार्थी रिश्तो को
कास पल पकड मे आता
ओर जिन्दगी इतनी स्वार्थी ना होती ।
छगन लाल गर्ग ।