Sunday, April 24, 2016

बेअर्थ ।

हर्ज क्या किसी को
यदि मैं कह देता बेअर्थ
तुम्हारा सच
जो जी चुका पूर्ववत तुम्हारे संग
आज हो चुका निर्लिप्त तुमसे भी
तुम्हारे अतीत से भी
पर सचेत करना जरूरी
संभलकर चलने वालो को सुनाता
बेअर्थ बोल हमारे
जहां उलझन बचाव निमित्त
झूठ जीये
आधुनिक कला ओर फेशन की तरह
सत्य से किनारा कर असत्य को दिये
रंगीनियत के जज्बात
उल्टे लटके चित्र की आधुनिकता के नाम
नासमझी का सौन्दर्य व्यक्तव्य देते रहे
हम तुम गहरी तन्द्रा जीते रहे
पर आज शब्द नही देते वही अर्थ
अधिकतर शब्दो की सार्थकता रही नही
हमारे कारणवश
सत्य व शब्द मध्य बढाते रहते
हम प्रति सृजन घना अंतराल
नही लगता सत्य शब्दमय हो सके।
छगन लाल गर्ग ।