खालीपन नहीं भाता
संतप्त हर पल
नीरसता अकर्मण्यता के
डरावने छाये
नहीं देते विश्रान्ति
बढता जाता बेबूझ भटकाव
कुछ संग्रहण निमित्त
हर संकेत लगता बुलाता मुझे
आशाओं का बहाव लेता अंगडाई
ओर गिरता जाता तृष्णा नद
जख्म लिए अनगिनत
करता पीपासा शांत संग्रहण
ढक जाता हर जीवन्त अंश
जड पदार्थों की स्थूल चमक
घीर जाता अस्तित्व
वैभव की मदभरी दुनिया
भीतर प्राणों से छूटता जाता
अपनत्व भरा लगाव
नहीं कर पाता स्वयं से साक्षात्कार
जैसे ही भरता खालीपन वैभव से
पर अब अतीत नहीं
खाली खाली जहां मात्र नाम गूँजता
इंसानियत का सृजक का गुणदायक ।
छगन लाल गर्ग ।