Wednesday, April 6, 2016

संसार जीया ।


कब क्या कहना पडा
कैसे बताऊँ
नहीं बाँधता गठरी पल
ओर विचारों का आना जाना
कब रहा एक सा
कि लगाऊँ अनुमान
कभी दर्द देते
संवेदनशील क्षण
ओर अभिव्यक्ति भी
नहीं रही कभी मेरी
कि रहे स्मृति पटल
क्या कहूँ यही सत्य
नहीं अहसास मुझे
किस दिव्य शक्ति से
आते पल ओर कर जाते
मुझे विलीन
कि नहीं बच पाता मैं
एक स्वप्नवत दशा बेबूझ
आती ठहरती
अज्ञात सा ठगा सा
केवल पात्र बना सा
वही करता
जो अदृश्य संकेत देता
नहीं स्मृति मे
वे रहने योग्य पल
मैं की अनुपस्थिति मे
कौन लेता
लेखा जोखा या कि
हिसाब की स्मृति
हाँ संसार जीया
याद है ना वे क्षण
जिनको मेरा मैं बन कर जीया
जहाँ केवल वासना की प्यास
अतृप्ति का अधजला धुआँ
याद रहा आज भी
बार बार दिलाता
मानव होने का अहसास ।
छगन लाल गर्ग ।