ले चल मुझे साथी मेरे
व्यर्थ हुआ जाता क्षमता का
अहंकार
नहीं शरीर ओर प्राणों का समन्वय
विपरीत प्रकृति
ससीम तन का जौश केवल तन्द्रा
अज्ञान का पूँज
शिथिल होते ही हुआ तार तार
विवश कातर क्षुब्ध दशा
टूटता अहंकार ही नहीं स्व भी
चेतन अचेतन का यह विश्रृंखल रूप
असमझस भरा
ओर जर्जर हुए जीवन क्षण भी
चलना रहा हैं बाकी
प्राण कहे तक
मेरे संसार पथगामी
ले चल मेरे साथी
नहीं स्वच्छ अब संसार अपना
स्वप्न धूमिल सागर लहरें
कोलाहल बन रहा मोह जाल अब
तजना चाहूँ साथी अवनी
निश्छल स्नेहिल रागमय निर्झर
गगन मूर्त बन स्वर संगीत बना
कहता मधुमय वेराग्य राग घना
ले चल वहीं अब साथी मेरे
अनंत असीम से आती लहरें
अदृश्य बिम्ब स्वर बन गूँजन देती
शायद भीतर स्व रिक्त हुआ रे
खालीपन का भान हुआ रे
अस्तित्व संग अपनत्व अब व्यर्थ हुआ रे
चल रे साथी देर हुई रे
ले चल मुझे भी साथी मेरे ।
छगन लाल गर्ग ।
व्यर्थ हुआ जाता क्षमता का
अहंकार
नहीं शरीर ओर प्राणों का समन्वय
विपरीत प्रकृति
ससीम तन का जौश केवल तन्द्रा
अज्ञान का पूँज
शिथिल होते ही हुआ तार तार
विवश कातर क्षुब्ध दशा
टूटता अहंकार ही नहीं स्व भी
चेतन अचेतन का यह विश्रृंखल रूप
असमझस भरा
ओर जर्जर हुए जीवन क्षण भी
चलना रहा हैं बाकी
प्राण कहे तक
मेरे संसार पथगामी
ले चल मेरे साथी
नहीं स्वच्छ अब संसार अपना
स्वप्न धूमिल सागर लहरें
कोलाहल बन रहा मोह जाल अब
तजना चाहूँ साथी अवनी
निश्छल स्नेहिल रागमय निर्झर
गगन मूर्त बन स्वर संगीत बना
कहता मधुमय वेराग्य राग घना
ले चल वहीं अब साथी मेरे
अनंत असीम से आती लहरें
अदृश्य बिम्ब स्वर बन गूँजन देती
शायद भीतर स्व रिक्त हुआ रे
खालीपन का भान हुआ रे
अस्तित्व संग अपनत्व अब व्यर्थ हुआ रे
चल रे साथी देर हुई रे
ले चल मुझे भी साथी मेरे ।
छगन लाल गर्ग ।