Friday, April 22, 2016

हकीकत ।

कैसे कहूँ हकीकत
आखिर अपनी लज्जा का सवाल
आडंबर का रंगीन आवरण
ढकता रहता हूँ
लोग अपने ही करते रहते चर्चा
काल्पनिक अनुमान से
भीतरी मर्म हर बार हो जाता रहस्य
कारण जानता हूँ मैं
अधिकांश का जीवन ठीक मेरी तरह
ओर हुबहू वहीं करते जाते
जो इज्जत बढ़ाने निमित्त करता हूँ मैं
बाहर बाहर टीम टाम
ठीक शरीर की तरह बनना संवरना
ओर बनावट का प्रदर्शन
ओर भीतर भीतर होता रहता जर्जर
उधारी के कर्ज डूबा साहूकार
ठीक शरीर के कंकाल की तरह
ओढता पहनता रहता चमकती पौशाक
यह दोगलापन जीता बन चुका
प्रख्यात इज्जतदार धनी
ओर प्रजातंत्रीय व्यवस्था का नहीं रहा
अब केवल मैं
हम बन चूके बहुमत हमारा
हम ही से चलता प्रशासन सत्ता
ओर बढाते रहते प्रत्येक कदम हम
शानो शौकत मातृभूमि तेरी
बोलते जाते मुँह धोने से पहले गुणगान मे
भारतीय गणतंत्र व भारत माता की जय ।
छगन लाल गर्ग ।