Monday, April 25, 2016

मंगल चाह ।

मंगल की चाह मन रखता
जीने की करता जाता कोशिश
नही हो पाता जीना मेरा
मूढता मानक बन जाता ओरों में
जानते करते परेशान
ओर बडी अजीब दशा गुजरता
जब चिढाने निमित्त
घेरे करते मूढता का प्रदर्शन पशुतुल्य
बहुत दूर निकल चुकी मानव से मानवता
अचंभित सा नवयुग का देखता हूँ दृश्य
उठती मूढता की लहरें मेरे आसपास  
ओर जानता हूँ मैं
जगत मे कोई भी कार्य निष्परिणाम नही
अति सूक्ष्म तरंगे फैलती चारों और
वातायन अनुसार
दोनो राहें उर्ध्व भी अधो भी
अब हम जगत को देते क्या इस तरह
मंगल या कि अमंगल
मनन चिन्तन के पदाधिकारी क्या सोचेंगे
इस तनिक मामूली बात पर
विनती मेरी मानवीयता कारण ।
छगन लाल गर्ग ।