कपाट
नहीं खोलता
वेदना होना चाहती
स्थानांतरित
अधिक वेग से
उफान आता
निकलकर घेरना चाहती
मस्तिष्क
करती विकल विवेक
ना रह सकूँ मानव
उन्मत दशा घीरा बेअर्थ
शरीर रहूँ
यही कारण
नहीं खोलता कपाट
चेतना के
ठीक हैं अचेतन
गूढता उसकी
शुकून भरती हृदय सागर
हिलोरें उठती गिरती
करता महसूस
भावना भूख मिटती
कृत्य देख
संसार सार रहस्य परत
उघडती जाती
अजान पर
अपनी सी मुस्कान आती
ठीक से
सामंजस्य करती
हिलोरों संग
ओर समझ आने लगता
जीवन तुच्छता मर्म
लगता मेरा
पाया भी अब हुआ अनपाया
भ्रमित सा हूँ अब
अदृश्य दीदार से पाता
नही बंद कपाट सत्य के
खुले सदैव
देखने मे नहीं सक्षम
भ्रमित जगत की आँखें
नहीं खुलती सत्य तेज के आगे
स्थूल आँखें तभी भ्रमित हुआ
अनजान रहा हर बार सत्य
हृदय खूब सरल
मान लेता अंधेरा घना
जीवन सत्य ।
छगन लाल गर्ग ।