Thursday, April 28, 2016

संतप्त अतीत ।

संतप्त करता अतीत
अपने अस्तित्व के लिए
वर्तमान को
कि आंशिक ही सही
वर्चस्व का उभार बार बार सताये
प्रतिशोध की तरह
अकारण बेकसूर होते भी
 कसूरवार की तरह
अंतरमन का अतीत से जुड़ाव
बेमेल रिश्ते की तरह
सालता व्यतीत होता
नहीं कारण पाता वर्तमान से
कि जीये अतीत बन
निर्जीव निष्क्रिय अचेतन
पर यह मन अतीत ही हैं
त्यागे इसके
अतीत भी मन भी दमित होता
ओर यह त्याग
नहीं सामान्य क्रिया
कि संभव हो सके
बिना मर्मज्ञता भीतर की
एक उलझनभरा समझोता
विपरीत प्रकृति का
मन ओर चेतना बीच
वर्तमान ओर अतीत बीच
ओर कच्चापन लिए
यह तन ओर विवेक
गहरा भंवर घीरा यह अस्तित्व
क्या हो कैसे हो
चिंतन भार से बाधित ग्रसित जीवन
आह यह भार
नहीं होता समायोजित
जीवन ओर मृत्यु के अंतराल बीच
अदृश्य असीम अव्यक्त
बहुत दूर तक नहीं कर पाता यात्रा
अतीत का मारा मन
प्राणों का राग गाना चाहता
अस्वर अराग अविरल संगीत
ओर यह सब
नहीं होगा अतीत ना भावी
करना होगा अभी
आओ मन झूको आगे
वर्तमान बन
कि पा सको असलियत तुम्हारी भी
जीवन कारण भी ।
छगन लाल गर्ग ।