हर किसी को पसंद अपनी नीजता
नही चाहता कोई अवरोध हो
उसके अपने हित
ओर यही कारण कमरों के सिमटते दायरे
ओर बड़ी संकीर्ण हो उठती
श्वासों की रफ्तार हर श्वास दूसरी में
डालती अवरोध ओर जीवन लगता दुर्भर
यह संकरापन केवल दीवारों मे नहीं उभरा
जीवन की हर जरूरत
आदी होने लगी इसी मानक
ओर व्यक्ति की भावना कामना में
आने लगा बनावटी पन जरूरत लायक
हो चुके संबंध अब नहीं लगता
असली नकली मे नहीं ज्यादा संचय
वहीं हो जाता असली जो बनता सहारा
यह तब्दीली अंतिम नहीं पर निरंतर सक्रिय
लेने लगी आकार प्रगति बन
शायद इसी कारण मानव से परिष्कृत
हम सभी आज बन चुके सभ्य ओर यांत्रिक
धरातलीय महक त्याग कर लेने लगे
मंगलीय श्वास
ओर दलित पीछडो की छाती पर चढ़े
करते जाते तकनीकी डिजिटल तरक्की
स्मार्ट लोगों हित स्मार्ट सीटी का निर्माण
अच्छा हैं तरक्की नीजता विस्तार ले
ओर देश बनता रहे विश्व गुरु ।
छगन लाल गर्ग ।