दोस्त मेरे सहारा दो
डूब रहा विडंबना ताल
वक्त घाव देता जाता
औषधि बनकर छाया दो
नहीं आये काम सब
जिनके लिए विलग हुआ
कुटुम्ब त्याग परिवार बना
जीवन लांछित किया
आज वहीं औलाद मेरी
धन जोड़ धनवान हुई
नहीं गरज अब सखा मेरे
ममता शर्मसार हुई
रिश्तों का मापदंड नहीं रहा
धन तुला रिश्ते तुले
अहसास फर्ज नहीं रहा
दोस्त मेरे सहारा दो
मोहाशक्त नहीं अब सखा मेरे
सम्बल दो तुम खड़ा रहूँ
हर कर्म पर नेह दो
ममत्व चाहता अपनत्व से
हर व्यवहार कसक घनी
घाव रिसते हैं घने
औषधि स्नेह लेकर घाव
भरो ना सखा मेरे
रिक्त ममत्व हृदय सुखा
धरातल चटक ना जाय
मेरे हमदम सहारा बनो
प्रेम के जीवंत क्षणों
आओ ना बरस शीतल करो
परिवार तुम सहारा बनो
पारावार नेह का
पावन हो तुम मोह दो
बनो तुम फिर एक बार
सेतु अंतिम बार तर सकूँ
स्नेह गूँथे अनगिनत सपने
अपनों से पूर्ण कर सकूँ
ओलाद सुख नहीं तो क्या
दोस्त मेरे सहारा बनो
नही पाई आज तक
स्वच्छन्द रमणियता
अदृश्य अंकुश नित्य रहा
संतुलन जीवन व्यतीत रहा
बीच मझधार डूबा हूँ आज
छोड मझधार अपने गये
छलना के सुंदर जाल घीरा
मानवीय संवेदना रही नहीं
सखा नही भाई मेरे उबार लो
दोस्त मेरे सहारा दो ।
छगन लाल गर्ग ।