स्वतः नही उठते कदम
बिना श्रृद्धा
कुंभ महोत्सव दे रहा बुलावा
घने श्रध्दा आस्था मय राग लेते लहर
अति भीतर
ओर मै करने लगा हूँ आमंत्रित मेरी तरह
डूबने का ख्याल रखते मित्रों को
अंतिम दशा का सच जानना हो सके संभव
कुम्भ में
देखता हूँ नित्य मीडिया से
गेरू ऐ रंग में विशाल सजी सजायी मेरी
मनोभावना का साक्षात आकार
आह यह रूप एक रंग हुआ आस्थावान
नही नसीब देने को
पर पाता इतराने लगा अपने भाग्य पर
ईश्वर का असीम स्नेह बरसना चाहता
करता आमंत्रित मुझे
तन मन की यह श्रृद्धा भरी गति पहली बार
आस्था की ऊंचाई ले चढती मुझे
आओ ना साकार सत्य पाये
कुंभ मेले मे
ईश्वरीय दुर्लभ अनुभूति जीवन का सार
अनायास आया अवसर
आओ सभी मित्रो मेरे अपनो
बुलावे का अप्रत्यक्ष अहसास कर
अपना मानव भव सुधारे ।
छगन लाल गर्ग ।
बिना श्रृद्धा
कुंभ महोत्सव दे रहा बुलावा
घने श्रध्दा आस्था मय राग लेते लहर
अति भीतर
ओर मै करने लगा हूँ आमंत्रित मेरी तरह
डूबने का ख्याल रखते मित्रों को
अंतिम दशा का सच जानना हो सके संभव
कुम्भ में
देखता हूँ नित्य मीडिया से
गेरू ऐ रंग में विशाल सजी सजायी मेरी
मनोभावना का साक्षात आकार
आह यह रूप एक रंग हुआ आस्थावान
नही नसीब देने को
पर पाता इतराने लगा अपने भाग्य पर
ईश्वर का असीम स्नेह बरसना चाहता
करता आमंत्रित मुझे
तन मन की यह श्रृद्धा भरी गति पहली बार
आस्था की ऊंचाई ले चढती मुझे
आओ ना साकार सत्य पाये
कुंभ मेले मे
ईश्वरीय दुर्लभ अनुभूति जीवन का सार
अनायास आया अवसर
आओ सभी मित्रो मेरे अपनो
बुलावे का अप्रत्यक्ष अहसास कर
अपना मानव भव सुधारे ।
छगन लाल गर्ग ।